Wednesday, July 24, 2024
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पेपर लीक पर नया कानून कितना असरदार:एक्‍सपर्ट ने कहा- मौजूदा कानून नकल करने वाले छात्रों पर फोकस्ड; नए कानून से माफिया पर रोक लगेगी

केन्‍द्र सरकार ने 21-22 जून की दर्मियानी रात पब्लिक ए‍ग्‍जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 लागू कर दिया है। इस एंटी पेपर लीक कानून के तहत, पेपर लीक या आंसर शीट के साथ छेड़छाड़ करने पर कम से कम 3 साल जेल की सजा होगी। इसे ₹10 लाख तक के जुर्माने के साथ 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है। ये कानून पेपर लीक माफिया पर शिकंजा कसने में किस हद तक कामयाब होगा, ये जानने के लिए हमने बात की सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट विराग गुप्‍ता से। एडवोकेट गुप्‍ता ने 5 सवालों के जवाब में कानून की बारीकियां बताईं- सवाल 1: पब्लिक एग्‍जामिनेशन एक्‍ट 2024 के पहले तक पेपर लीक कराने या दूसरे की जगह परीक्षा देने जैसे मामलों में किन धाराओं में केस दर्ज होता था? इनमें कितनी सजा का प्रावधान था? जवाब : इस कानून के पहले IPC की धारा 420, 468 और 120B के तहत पुलिस मामला दर्ज करती थी। नए BNS कानून, जिन्हें 1 जुलाई से लागू करने की बात है, उनमें नए सेक्शन 318, 336 और 61A हैं। 420 और 468 के तहत चीटिंग और फोर्जरी के अपराध आते हैं। 120B के तहत आपराधिक साजिश के मामले दर्ज होते हैं। इनमें 7 साल तक की अधिकतम सजा और जुर्माने का प्रावधान है। ये सभी अपराध गैर जमानती हैं। केंद्रीय कानून से पहले, राज्यों में नकल रोकने और परीक्षा में धांधली रोकने के लिए कई कानून बने हैं। उड़ीसा में 1988 में, आंध्र प्रदेश में 1997 में, उत्तर प्रदेश में 1998 में, झारखंड में 2001 में, छत्तीसगढ़ में 2008 में, राजस्थान में 2022 में, गुजरात और उत्तराखंड में 2023 में ऐसे कानून बनाए गए हैं। नए केंद्रीय कानून और राज्यों के पुराने कानून में अगर फर्क रहा तो इसका फायदा एग्जाम माफिया को मिल सकता है। सवाल -2: नए कानून में भी 3 से 5 साल तक की सजा का प्रावधान है। ऐसे में नए कानून से क्‍या फायदा होगा? जवाब : नए कानून में चैप्टर 3 की धारा 10 और 11 में अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा का प्रावधान है। इन कानूनों में संगठित अपराध का भी जिक्र है। इसके अलावा, परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था, सर्विस प्रोवाइडर और एग्जाम माफिया सभी के लिए अलग-अलग तरह के अपराध और दंड का प्रावधान किया गया है। इस कानून के तहत दर्ज अपराधों की जांच डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस के स्तर पर ही होगी। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के चेयरपर्सन और मेम्बरों को लोक सेवक माना जाएगा। इसका मतलब है कि उनके खिलाफ अपराध के साथ भ्रष्टाचार का मामला भी चलाया जा सकता है। सवाल -3: क्‍या 3 से 5 साल की सजा ठोस कदम है? पेपर लीक माफिया पर इस कानून से शिकंजा कस पाएगा? जवाब : केंद्रीय कानून को पारित करते समय इनके साथ जो स्टेटमेंट आफ ऑब्जेक्ट्स लगाए गए थे, उसके अनुसार इन कानूनों का मकसद परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और क्रेडिबिलिटी बढ़ाने का है। कानून का मुख्‍य मकसद युवाओं का भरोसा बरकरार रखना और मेरिट को मान्यता देना है। राज्यों में जो पेपर लीक के कानून हैं उनमें नकल और चीटिंग जैसे छोटे अपराधों पर ज्यादा जोर है, जिसकी वजह से छात्रों को ही सजा देकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। लेकिन नए कानून का उद्देश्य नौकरियों से जुड़ी परीक्षाओं की साख को बहाल करना है। नए कानून से पेपर लीक जैसी गड़बड़ी में हर स्‍टेप पर काम कर रहे अपराधियों पर कार्रवाई की जा सकेगी। हालांकि, इसे असरदार तरीके से लागू करने के लिए राज्यों के साथ सहयोग जरूरी है। सवाल -4: नए कानून में फर्जी डिग्री या फर्जी यूनिवर्सिटीज के खिलाफ क्‍या प्रावधान हैं? जवाब : नए कानून में फर्जी वेबसाइट और फर्जी परीक्षाओं के माध्यम से धोखाधड़ी भी संगीन अपराध हैं। UGC हर साल फर्जी यूनिवर्सिटीज की लिस्‍ट जारी करता है। पिछली लिस्‍ट के अनुसार, 20 फर्जी यूनिवर्सिटी युवाओं को चूना लगा रही हैं। इसी तरह कई फर्जी कॉलेज भी चल रहे हैं जहां डिग्रियां बेची जाती हैं। ऐसे नकली संस्थान शिक्षा और नौकरियों में भ्रष्टाचार बढ़ा रहे हैं। नए कानून के अनुसार उनकी संपत्ति की जब्ती और नकल माफिया के खिलाफ कारवाई से सख्त सन्देश जाएगा। सवाल -5: पब्लिक एग्‍जामिनेशन एक्‍ट 2024 के तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे। इसका क्‍या मतलब है? जवाब : नए कानून की धारा 9 के अनुसार, इसके तहत दर्ज सभी मामले संज्ञेय, गैर जमानती और नान कंपाउंडेबल रहेंगे। संज्ञेय अपराध का मतलब है कि इन मामलों में पुलिस अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तार करने का अधिकार होता है। संज्ञेय अपराधों में CRPC की धारा 154 के तहत मजिस्ट्रेट की अनुमति के बगैर पुलिस अधिकारी को FIR दर्ज करने के बाद जांच शुरू करनी चाहिए। जबकि, असंज्ञेय अपराधों में अपराध की गंभीरता कम होती है, इसलिए FIR दर्ज करने के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति और आदेश जरूरी है। सीधे FIR दर्ज नहीं होती। कानून के तहत, अगर किसी गड़बड़ी में एग्‍जाम सेंटर की भूमिका पाई जाती है तो उस सेंटर को 4 साल तक के लिए सस्‍पेंड किया जा सकता है। यानी उस सेंटर को अगले 4 साल तक के लिए कोई भी सरकारी एग्जाम कराने का अधिकार नहीं होगा। किसी संस्थान की संपत्ति कुर्क करने और जब्त करने का भी प्रावधान है और उससे परीक्षा की लागत भी वसूली जाएगी। कानून के तहत, कोई भी अधिकारी जो DSP या ACP के पद से नीचे न हो, परीक्षा में गड़बड़ी के मामलों की जांच कर सकता है। केंद्र सरकार के पास किसी भी मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंपने की शक्ति है। UPSC, SSC की परीक्षाएं भी कानून के दायरे में
पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, इसी साल 6 फरवरी को लोकसभा और 9 फरवरी को राज्यसभा से पारित हुआ था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 12 फरवरी को बिल को मंजूरी देकर इसे कानून में बदल दिया। इस कानून में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB), बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान (IBPS) और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की परीक्षाएं शामिल होंगी। केंद्र के सभी मंत्रालयों, विभागों की भर्ती परीक्षाएं भी इस कानून के दायरे में होंगी।

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