Wednesday, July 24, 2024
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PM ने नालंदा विश्वविद्यालय के नए कैंपस का उद्घाटन किया:खिलजी ने आग लगाई तो तीन महीने तक जलता रहा कैंपस, अब्दुल कलाम ने पुनर्जीवित करने की मांग की

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज यानी 19 जून को नालंदा विश्वविद्यालय के नए कैंपस का उद्घाटन किया। उन्होंने करीब 15 मिनट तक 1600 साल पुराने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर का दौरा किया। इसके बाद प्रधानमंत्री प्राचीन नालंदा यूनिवर्सिटी पहुंचे। वहां उन्होंने नालंदा यूनिवर्सिटी के नए स्वरूप को देश को समर्पित किया। इस दौरान पीएम के साथ विदेश मंत्री एस जयशंकर, बिहार के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नालंदा में मौजूद हैं। कई देशों के राजदूत, केंद्र और राज्य सरकार के कई मंत्री भी नालंदा पहुंचे हैं। विशेष अधिनियम के तहत विश्वविद्यालय की स्थापना
ऐतिहासिक नालंदा महाविहार से 20 किलोमीटर से भी कम दूरी पर मौजूद प्राचीन मगध के शिक्षा केंद्र को पुनर्जीवित करने का फैसला, मूल रूप से 2010 में शुरू हुआ था। विश्वविद्यालय को संसद द्वारा पारित एक विशेष अधिनियम, नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, के तहत स्थापित किया गया है।
यूनिवर्सिटी लॉन्च किए जाने से तीन साल पहले साल 2007 में यूनिवर्सिटी के गठन का मार्गदर्शन करने के लिए एक सलाहकार समूह बनाया गया था। अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन इसके अध्यक्ष थे। बाद में सेन को विश्वविद्यालय का कुलपति यानी वाइस चांसलर नियुक्त किया गया।
1 सितंबर 2014 से एक अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग में स्कूल ऑफ इकोलॉजी एंड एनवायर्नमेंट और स्कूल ऑफ हिस्टोरिकल स्टडीज की क्लासेज स्टार्ट हो गई थी। उस वक्त 15 स्टूडेंट्स ने एडमिशन लिया था। जिनके लिए 11 टीचर्स अपॉइंट किए गए थे। कैंपस में सात डिपार्टमेंट हैं
विश्वविद्यालय पुनर्जीवित करने के बाद अब तक पोस्ट ग्रेजुएट और डॉक्टरेट स्टूडेंट्स के लिए सात स्कूल या डिपार्टमेंट बनाए गए हैं। इसमें इकोनॉमिक्स एंड मैनेजमेंट, इन्फॉर्मेशन साइंस एंड टेक्नोलॉजी, लिंग्विस्टिक एंड लिटरेचर, इंटरनेशनल रिलेशन्स, पीस स्टडीज (शांति अध्ययन) एंड बुद्धिस्ट स्टडीज, फिलोसॉफी एंड कंपेरेटिव रिलिजन, इकोलॉजी एंड एनवायर्नमेंट और हिस्टोरिकल स्टडीज शामिल है। इसके अलावा दो डिपार्टमेंट और इस एकेडमिक सेशन से शुरू होने वाले हैं। 17 देशों के 400 स्टूडेंट्स यहां पढ़ाई कर रहे हैं
इस समय विश्वविद्यालय में कुल 17 देश के 400 स्टूडेंट पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स के लिए यहां 10 सब्जेक्ट में पढ़ाई हो रही है। कैंपस में एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी भी बनाई जा रही है। कलाम ने दी थी विश्वविद्यालय को पुर्नजीवित करने की सलाह
दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 28 मार्च, 2006 को अपने बिहार दौरे पर अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल राजगीर आए हुए थें। उसी दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को पुर्नजीवित करने की सलाह दी थी। जिसके बाद मुख्यमंत्री ने उनकी सलाह पर तत्काल विधानमंडल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए इसे पुनर्जीवित करने की घोषणा कर दी थी।
UNESCO ने 15 जुलाई, 2016 को नालंदा विश्वविद्यालय का पुरातात्विक अवशेष को वर्ल्ड हेरिटेज साइट यानी वैश्विक धरोहर स्थल का दर्जा दिया था। बी.वी. दोशी ने किया है डिजाइन
विश्वविद्यालय को प्रसिद्ध वास्तुकार पद्म विभूषण स्वर्गीय बी.वी. दोशी ने डिजाइन किया है। इसके वास्तु शिल्प को प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने की दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। इसके बुनियादी ढांचे को नेट जीरो यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन वाले कैंपस के रूप में बनाया गया है। 1190 के दशक में बख्तियार खिलजी ने जलाकर खत्म कर दिया
1193 ई. में तुर्की शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में आक्रमणकारियों की सैन्य टुकड़ी ने विश्वविद्यालय को जलाकर खत्म कर दिया। नालंदा यूनिवर्सिटी का परिसर इतना विशाल था कि कहा जाता है कि हमलावरों के आग लगाने के बाद परिसर तीन महीने तक जलता रहा। आज के दिन में नजर आने वाली 23 हेक्टेयर की साइट मूल यूनिवर्सिटी कैंपस का एक हिस्सा भर है। गुप्त काल के दौरान हुई थी स्थापना
यह प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय तीसरी से छठी शताब्दी ईसवी के बीच में गुप्त काल के दौरान अस्तित्व में आया था। साल 427 में सम्राट कुमार गुप्त ने इसकी स्थापना की थी। 13वीं शताब्दी यानी 800 से अधिक वर्षों तक यहां विश्वविद्यालय संचालित होता रहा। नालंदा प्राचीन और मध्यकालीन मगध काल में एक प्रसिद्ध बौद्ध महाविहार यानी महान मठ हुआ करता था। ये दुनियाभर में बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षण केंद्र था। नालंदा विश्वविद्यालय में करीब 10 हजार स्टूडेंट्स पढ़ाई करते थे, जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे। अधिकतर स्टूडेंट्स एशियाई देशों जैसे चीन, कोरिया , जापान, भूटान से आने वाले बौद्ध भिक्षु थे। ये छात्र मेडिसिन, तर्कशास्त्र, गणित और बौद्ध सिद्धांतों के बारे में अध्ययन करते थे। चाइनीज स्टूडेंट ह्वेन त्सांग ने भी की पढ़ाई
प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने 7वीं शताब्दी में नालंदा की यात्रा की थी। त्सांग ने 630 और 643 ईसवी के बीच पूरे भारत की यात्रा की। उन्होंने 637 और 642 ई. में नालंदा का दौरा और अध्ययन किया। बाद में त्सांग ने इस विश्वविद्यालय में एक विशेषज्ञ प्रोफेसर के रूप में काम किया। यहीं उन्हें मोक्षदेव का भारतीय नाम मिला।
त्सांग 645 ईसवी में चीन लौटे। वे अपने साथ नालंदा से 657 बौद्ध धर्मग्रंथों को लेकर गए थे। ह्वेन सांग को दुनिया के सबसे प्रभावशाली बौद्ध विद्वानों में से एक माना जाता है। इनमें से कई ग्रंथों का उन्होंने चीनी भाषा में अनुवाद किया। नालंदा राजगीर शहर से लगभग 16 किलोमीटर उत्तर में और पटना से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है। ये NH 31, 20 और 120 के जरिए भारत के राजमार्ग नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। यह बोधगया से लगभग 80 किलोमीटर उत्तर पूर्व में है, गया बिहार का एक और महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है।

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