Saturday, June 15, 2024
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रकस-6:गैर असमियों को भगाने के लिए फौज बनाने लगे छात्र, 10 हजार से ज्‍यादा हत्‍याएं कीं; ULFA उग्रवाद की पूरी कहानी

6 अप्रैल 1981। चाय के बागानों से घिरी एक पहाड़ी पर एक जीप सुनसान अंधेरी सड़क पर खड़ी थी। उसमें IAS ऑफिसर पार्थसराष्‍ठी बैठे हुए थे। अचानक उन्हें जीप से किसी पत्थर या पक्षी के टकराने जैसी आवाज आई। वो उतरे और अंधेरे में ही ढूंढने लगे कि आखिर क्या टकराया होगा। वहां से गुजर रहे एक राहगीर ने उन्हें परेशान देखा तो मदद के लिए पास आ गया। पार्थसराष्‍ठी जिसे पत्‍थर समझ रहे थे वो दरअसल एक ग्रेनेड था। एक जोरदार धमाका हुआ और शवों के टुकड़े सड़क पर बिखर गए। न सिर्फ ऑफिसर पार्थसराष्‍ठी और राहगीर, बल्कि ग्रेनेड फेंकने वाला हमलावर भी धमाके में मारा गया। इस घटना के बाद 11 लोगों को शक के चलते गिरफ्तार किया गया इसमें ज्यादातर किसी न किसी यूनिवर्सिटी के स्‍टूडेंट्स थे। आज रकस के छठवें और आखिरी एपिसोड में बात असम में उठे उस छात्र आंदोलन की, जो जल्‍द ही उग्रवादी संगठन ULFA में बदल गया… 1971 के दौर में बांग्लादेश और पूर्वी पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था। इस युद्ध के चलते लगभग 1 करोड़ बांग्लादेशी रिफ्यूजी असम आए, जिसमें से 13 लाख रिफ्यूजी यहीं बस गए। असम राज्‍य के लोगों को लगा कि अगर इतने बांग्लादेशी असम में आ गए तो न उनकी भाषा बचेगी, न रोजगार और न ही जमीनें। इसका विरोध करने के लिए 7 अप्रैल 1979 को ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के मेंबर परेश बरुआ ने यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी ULFA संगठन बनाया। इसमें उनके साथी छात्र अरबिंद राजखोवा, गोलाप बरुआ उर्फ अनुप चेतिया, समीरन गोगोई उर्फ प्रदीप गोगोई और भद्रेश्वर गोहेन शामिल थे। इस संगठन ने शुरुआत में बांग्लादेशियों को नौकरियां करने और जमीन खरीदने का विरोध किया। कुछ ही समय में, असम की आजादी के लिए नगालैंड, मेघालय और मिजोरम राज्यों में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। हालांकि जल्‍द ही ये विरोध हिंसक हो गए। स्‍टूडेंट्स ने ली बम धमाकों की ट्रेनिंग असम लिबरेशन पार्टी यानी ALA के लीडर और छात्र नेता जयंत शर्मा ने छात्रों की एक फौज बनानी शुरू की। जयंत ने स्टूडेंट्स को अपने साथ मिलाया और उन्हें आर्मी की ट्रेनिंग दी, जिससे वे अप्रवासी बांग्लादेशियों को असम से भगा सकें। इस संगठन में धीरे-धीरे नॉर्थ-ईस्ट हिस्सों के स्‍टूडेंट्स यूनियन भी शामिल होने लगे। ये ग्रामीण इलाकों के छात्रों को जुटाते थे और उनको रहने के लिए घर देते थे। असम के जिला शिवसाग्र, नगांव, नलबारी, जोरहाट में अपने सारे फैसले करते थे और ग्रामीणों और छात्रों की मदद भी करते थे। ULFA द क्वेस्ट ऑफ सोविनटरी में नानी गोपाल महंत लिखते हैं, ‘छात्र क्यों इस संगठन में शामिल हो रहे थे, उन्हें खुद भी नहीं मालूम था। जैसे वे सिर्फ आर्मी और पुलिस से बदला लेने के लिए लड़ रहे थे। वे बम बनाना सीख रहे थे। वे पिस्टल चलाना सीख रहे थे। ऐसे ही एक बम बनाने की ट्रेनिंग में ब्लास्ट हुआ, जिसमें 10 छात्रों की मौत हो गई। इसके बाद ULFA ऑर्गेनाइजेशन ने तय किया कि वो अपने संगठन को एक बेहतर ट्रेनिंग देंगे, उसके बाद ही हमले करेंगे। ULFA के एक्टिव सदस्य रहे सुनील नाथ ने 20 अप्रैल 2002 को ‘अमर असोम’ अखबार को इंटरव्‍यू दिया। उन्‍होंने कहा, ‘जब मैं कॉलेज में था, तब मैं असम मूवमेंट का सदस्य बना। हमने सोचा था असमियों के लिए ये आखिरी लड़ाई होगी। चाहे कुछ भी हो हमें असम के लोगों को बचाना है। अगर हम इसे पाने में असफल हो गए तो असमियों की पहचान खत्म हो जाएगी।’ बेकाबू हिंसा के चलते लगा राष्‍ट्रपति शासन ‘ULFA द क्वेस्ट ऑफ सोविनटरी’ में नानी गोपाल महंत लिखते हैं, ‘छात्र नेता परेश बरुआ ने ये मान लिया था कि उनकी आवाज सुनी नहीं जा रही है। सत्याग्रह और शांति की आवाज दिल्ली तक नहीं जा सकती। वहां तक बंदूक और धमाकों की आवाज ही पहुंचेगी।’ परेश की अगुआई में छात्रों के समूह गैर असमियों को निशाना बनाने लगे। 1979 से 1983 तक, असम में 430 बम धमाके किए गए, जिनमें 1 हजार से ज्यादा मौतें हुईं। इसमें बैंक अधिकारी, पुलिस और आर्मी के जवान, प्रोफेसर, आईएएस, बिजनेसमैन सभी शामिल थे। 2 फरवरी 1980 को पहली बार सरकार ने ऑल असोम स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी AASU से बातचीत की। मगर इसका कोई हल नहीं निकला। 28 मार्च को पहली बार राज्‍य में आर्मी तैनात कर दी गई। 30 जून 1981 को स्‍टूडेंट्स यूनियन और आर्मी के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें 5 जवान मारे गए। इसके बाद असम में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 13 जनवरी 1982 को राष्ट्रपति शासन हटा, लेकिन 2 महीने बाद 13 मार्च को एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। चुनाव के विरोध में छात्रों ने की हत्‍याएं 1983 में असम में विधानसभा चुनाव होने थे। ULFA के सदस्यों ने इस चुनाव का बहिष्कार किया और इससे जुड़े सरकारी कर्मचारियों की हत्याएं करनी शुरू कर दी। परेश बरुआ ने अपने साथी अनुप चेतिया और चक्र गोईंन के साथ मिलकर डिगबोई के घने जंगलों में अपना पहला बेस कैंप बनाया। कई जगह हुए बम धमाकों में 19 लोगों की जान गई। स्टूडेंट्स लीडर बी बारूच, मूइन नोबिस समेत राज्य के कई स्टूडेंट्स यूनियन का मानना था कि केंद्र में बैठे लोग इसी तरह हमारी बात सुनेंगे। 1979-80 के समय नॉर्थ स्टूडेंट्स यूनियन ने ULFA उग्रवादियों की मदद की और IAS अधिकारियों से लेकर आम लोगों को निशाना बनाया। इसी समय लौलंग आदिवासियों ने नागौन जिले में 2191 बांग्लादेशी मुस्लिमों की हत्या कर दी। इंडियन डॉग्‍स लीव असम के नारे दिए गए 19 अप्रैल 1980 ULFA संगठन के लोग कांग्रेस एमएलए हितेश्वर साइक्या को प्रो-बांग्लादेशी समझते थे। इस समय तक हितेश्वर कांग्रेस पार्टी में मिनिस्टर थे। साइक्या अपनी सरकारी गाड़ी से गरगांव बालीघाट इलाके से जा रहे थे, तभी ULFA उग्रवादी हरी बोरकाटी ने उनकी गाड़ी को घेरा और उनपर ग्रेनेड फेंक दिया। ग्रेनेड तुरंत नहीं फटा और ग्रेनेड फटने से पहले ही साइक्या वहां से हट गए। ULFA सदस्य हरी बोरकाटी की मौके पर ही मौत हो गई। ULFA संगठन ने उसे अपना पहला शहीद कहा। इसके बाद कॉलेजों के स्‍टूडेंट्स सड़कों पर तख्तियां लेकर घूमने लगे। इन पर लिखा होता था, ‘असम को रूल करने का भारत को कोई अधिकार नहीं, असम को आजाद करो और इंडियन डॉग्‍स लीव असम।’ चाय बागान मालिकों से ULFA वसूलने लगा टैक्‍स राज्‍य के अधिकतर चाय व्‍यापारी बाहरी थे। ऐसे में उग्रवादियों ने कई चाय बागान मालिकों का अपहरण किया और हत्‍याएं भी कीं। इनमें भारतीय-ब्रिटिश मूल के बिजनेसमैन स्वराज्य पॉल के भाई सुरेन्द्र पॉल भी शामिल थे। उग्रवादियों ने चाय बागान मालिकों और दूसरे बड़े व्‍यापारियों से टैक्‍स वसूलना भी शुरू कर दिया। उस समय टाटा टी के चेयरमैन दरबारी सेठ ने भी ULFA उग्रवादियों को टैक्स चुकाने की बात मानी और उन्हें टैक्स चुकाया। शांति के लिए असम अकॉर्ड साइन हुआ 1985 में राज्‍य में ‘असम गढ़ परिषद पार्टी’ की सरकार बनी और प्रफुल्ल कुमार महंत सीएम बने। महंत स्टूडेंट्स यूनियन के सदस्य रह चुके थे। उनके सत्‍ता में आने से ULFA के सदस्यों को लगने लगा था कि हमारे पास मुख्‍यमंत्री का सपोर्ट है। इस समय सरकारी अधिकारी भी जैसे कोई एक्शन लेने के मूड में नहीं थे। वे असम में घट रही घटनाओं पर चुप थे। ULFA की उग्रता को खत्म करने के लिए 1985 में असम अकॉर्ड पर साइन हुए। इस पर पहले भी कई बार बात की जा चुकी थी। हालांकि पहले बात नहीं बन पाई थी। इस समझौते के अनुसार 1 जनवरी 1961 से 24 मार्च 1971 तक जितने भी लोग असम आए हैं, उनको अप्रवासी माना जाएगा और अगले 10 सालों तक उनके पास वोट करने का अधिकार नहीं होगा और उन्हें वापस भेजा जाएगा। हालांकि इस समझौते से भी राज्‍य में शांति बहाल नहीं हुई। ULFA ने गैर असमियों को निशाना बनाना जारी रखा। ऑपरेशन बजरंग ने लगाई हिंसा पर लगाम 4 दिसंबर 1990। पुलिस को लखीमपुर के जंगल में 30 से ज्यादा शव मिले जिनमें 15 से ज्यादा सड़ चुके थे। इन्‍हें बहुत टॉर्चर कर मारा गया था। इनमें से कुछ ही लोगों की पहचान की जा सकी, जिनमें चाय व्‍यापारी राधेश्याम लहोटी, कांग्रेस वर्कर राणा गोस्वामी समेत कई आम लोग शामिल थे। अगले महीने 12 जनवरी को 35 शव और बरामद किए गए। ULFA के इस हिंसक उग्रवाद से ये साफ था कि हर वो शख्स उनका दुश्मन था, जिसने उन्हें टैक्स नहीं चुकाया या उनकी कही बात नहीं मानी। ऐसे में सरकार ने 1990 में ULFA के खिलाफ ऑपरेशन बजरंग शुरू किया। सेना के जवानों ने ULFA एक्टिविस्ट्स पर ताबड़तोड़ हमले किए। इन हमलों में कई उग्रवादी गोलियों का शिकार हुए। 2,800 संदिग्ध उग्रवादियों को गिरफ्तार किया गया। 1,208 हथियार और 5 करोड़ रुपए भी जब्त किए गए। ULFA ने भी इसके खिलाफ जवाबी कार्रवाई की, जिसमें 58 लोग मारे गए। इसके बाद ULFA के हौसले पस्‍त पड़ने लगे। उग्रवादियों ने राज्‍य में शांतिपूर्ण चुनाव की बात मान ली और 1 मार्च 1991 को ऑपरेशन बजरंग को रोक दिया गया। सरकार ने 20 अप्रैल को ऑपरेशन वापस भी ले लिया। 31 दिसंबर 1991 को ULFA कमांडर-इन-चीफ हीरक ज्योति महंत की मौत हो गई। इसके बाद उल्फा के करीब 9 हजार सदस्यों ने आत्मसमर्पण कर दिया। माफी पाकर छूटे और फिर हिंसक हो गए ULFA उग्रवादी डीजीपी हितेश्वर सैकिया ने 30 जून 1992 को असम में अपना कार्यभार संभाला और ULFA कैदियों को आम माफी दे दी। बाहर निकलते ही ULFA उग्रवादी एकजुट हुए और एक हफ्ते के भीतर ही 14 सरकारी अधिकारियों का अपहरण कर लिया। एक बार फिर आर्मी ने ऑपरेशन चलाया। ऑपरेशन ब्लूप्रिंट के तहत निगरानी शुरू की गई। फिर से सोर्स जुटाए गए और तेजी से हमला करने की योजना बनाई गई। 10 पुलिस वालों की हत्‍या के आरोपी ULFA उग्रवादी को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद पूरे राज्य और इसकी सीमाओं पर ऑपरेशन रायनो लॉन्च हुआ। तारीख थी 15 सितंबर 1992। इस ऑपरेशन का उद्देश्य ULFA को बातचीत की मेज पर लाने के लिए मजबूर करना था। इसमें पैरामिलिट्री फोर्स को 270 कंपनियों के सहयोग से तैनात किया गया। पहले हफ्ते के आखिर तक 12 कैंपों पर छापे मारे गए और 258 ULFA नेता और समर्थकों को अरेस्ट कर लिया गया। उग्रवादियों ने बच्‍चों की भी हत्‍याएं कीं साल 1995। ULFA उग्रवादियों ने मंत्री और 4 पुलिसकर्मियों को मार डाला। इसके बाद नलबारी जिले में 27 हजार से ज्यादा लोगों में आपसी संघर्ष हुआ। इसमें एक तरफ ULFA उग्रवादी थे, वहीं दूसरी तरफ आम लोग और पुलिस अधिकारी शामिल थे। आधिकारिक डेटा के अनुसार इसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए। 2004 में नॉन असमियों को राज्‍य से बाहर करने के लिए जमकर खून-खराबा हुआ। इसी साल सबसे ज्यादा नॉन असमी हिंदी भाषियों को मारा गया। उग्रवादियों ने धेमाजी जिले में एक बस को बम से उड़ा दिया, जिसमें 15 बच्चों की मौत हो गई। डिब्रूगढ़ में 15 हिंदी भाषियों की हत्‍या की गई और 12 और लोगों को नलवारी इंडो-भूटान फॉरेस्ट में मार दिया गया। सिबसागर में 10 हिंदी भाषी और 4 बिहारियों को मारा गया। लंबे समय से असम में रहे 22 हिंदी भाषियों को भी गोलियों से भून दिया गया। 2 हिस्‍सों में टूट गया ULFA 2008 में उल्फा के नेता अरबिंद राजखोवा को बांग्लादेश से अरेस्ट कर लिया गया और भारत को सौंप दिया गया। राजखोवा ने सरकार से शांति समझौते की बात की तो ULFA दो हिस्सों में बंट गया। राजखोवा ने हिंसा का रास्‍ता छोड़ दिया। वहीं, परेश बरुआ ने अपने संगठन को ULFA (I) नाम दिया और हिंसक विरोध जारी रखा। राज्‍य में NRC लागू हुआ दशकों चली हिंसा के बाद असम नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटिजनशिप यानी NRC लागू करने वाला देश का पहला राज्‍य बना। 2013 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक राज्‍य की NRC लिस्‍ट तैयार करने का काम शुरू किया गया। इसमें 24 मार्च 1971 से पहले भारत आ चुके नागरिकों के नाम शामिल किए गए। 30 जुलाई 2018 को असम में NRC का आखिरी ड्राफ्ट जारी किया गया। हालांकि लगभग 40 लाख लोग इस लिस्‍ट से बाहर रह गए। इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘असम लंबे समय से ULFA की हिंसा से पीड़ित रहा है। NRC लागू होने से असम में शांति का एक नया अध्याय शुरू होगा।’

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